Thursday, September 7, 2017

अभी और लंकेश का मरना बाकी...

गौरी लंकेश की अंतिम विदाई 
एक तथाकथित पत्रकार होने के नाते यह कह सकता हूं कि गौरी लंकेश एक खबर है. पंसारे, कुलबर्गी और लंकेश जैसे पत्रकार आने वाले समय भी मारे जाएंगे. हम लोग तब भी यहीं पूछेंगे कि स्वतंत्र अभिव्यक्ति को क्यों दबाया गया? किसने की हत्या?

पंसारे, कुलबर्गी और लंकेश तो चर्चित लोग थे इसलिए इतना विरोध प्रदर्शन भी हो गया. या कह लो की एक खास विचारधारा से संबंधित होने के नाते इतना विरोध प्रदर्शन देश भर के पत्रकारों ने कर दिया. लेकिन उन पत्रकारों (राजदेव रंजन, जगेंद्र सिंह, संदीप कोठारी, रामचंद्रछत्रपति, राजेश मिश्रा, साई रेड्डी और बहुत लोग) के समर्थन में कितने लोग आए, जो अब तक मारे गए. कितने लोगों ने और कब तक विरोध प्रदर्शन किया? सिर्फ उनके साथ काम करने वाले लोग या वो लोग जो उस संस्थान जुड़े हुए थे. एक-दो चैनलों ने थोड़ी-बहुत कवरेज की और एक दो बार फॉलोअप किया. लेकिन उनके हत्यारों का अभी तक पता नहीं चला है. फिर हम लोग शांत हो गए, एक अभिव्यक्ति की आवाज दबने तक. फिर हम शांत हो जाएंगे अगली अभिव्यक्ति की मौत तक.

अब यही हाल गौरी लंकेश के साथ भी होगा? उम्मीद है पुलिस इनके हत्यारों का पता लगाने के साथ-साथ हत्या करने का कारण भी पता लगाए. इसके साथ यह भी पता लगाए कि हत्या किसी राजनीतिक दबाव में हुई या किसी सामाजिक दुश्मनी के कारण हुई?

लंकेश की हत्या पर हो रहे पत्रकारों के प्रदर्शन भी खास विचारधारा से प्राभावित लगती है. नहीं तो इनसे पहले हुई पत्रकारों की हत्या पर कितने पत्रकारों को ने इस तरह का विरोध या शोक जताया.

मैं तमाम मीडिया हाउस से उम्मीद करता हूं कि गौरी लंकेश की मौत से आहत होने के साथ-साथ न्याय मिलने तक पुलिस प्रशासन पर सवाल उठाते रहें. लंकेश को खबरों और प्राइम टाइम की डिबेट तक सीमित न रहने दे.
गौरी लंकेश और उनकी पत्रकारिता को नमन