Wednesday, December 18, 2019

डीटीसी ड्राइवर और दिल्ली गेस्ट टीचर से किया वायदा भूल गए अरविंद केजरीवाल!

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया (फोटोः एके फेसबुक)

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री-शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया सहित आम आदमी पार्टी सार्वजनिक तौर पर ढिंढोरा पीट रहे हैं कि उन्होंने अपने सभी चुनावी वायदे पूरे कर लिए हैं. उनका आखिरी वादा दिल्ली में फ्री वाई-फाई था. जिसे पूरा करने की शरुआत हो चुकी है.  लेकिन आपसे इस तरह कीउम्मीद नहीं थी. मुख्यमंत्री साहेब!

मैं वर्षों से दिल्ली में चलने वाली बसों में सफर कर रहा हूं. डीटीसी के ड्राइवर और कंडक्टर से भी अक्सर बात हो जाती है. आपका सबसे पहला वादा दिल्ली परिवहन निगम के अस्थाई ड्राइवर और कंडक्टर को पक्का करना था. जोकि अभी तक नहीं हुआ. डीटीसी के ड्राइवर और कंडक्टर न जाने कितनी बार धरने पर बैठे पर लेकिन उन्हें झूठा दिलासा दिया गया. कई बार उन्हें मजबूरी में अपनी हड़ताल वापस लेनी पड़ी. अभी तक हज़ारों डीटीसी ड्राइवर और कंडक्टर पक्के नहीं हुए है.

डीटीसी बस के प्रकार

अरविंद केजरीवाल और दिल्ली के परिवहन मंत्री कैलाश गहलोत ने पिछले दो महीने के अंदर 200 क्लस्टर बसों को इनॉग्रेट किया. लेकिन इससे किसका फायदा होगा?  सबसे लोगों को क्लस्टर और डीटीसी बसों के डिफ्रेंस को समझना होगा. दिल्ली में अभी 4 तरह की डीटीसी बस (DTC Bus Type) हैं. एक हरे रंग की लो फ्लोर बस, लाल रंग की लो फ्लोर बस (जिन्हें हम एसी बसें कहते हैं), इलेक्ट्रिक बस जो सिर्फ तीव्र मुद्रिका और 522 रूट पर कुछ दिनों तक चली. 

डीटीसी की डीएस सर्विस

चौथी कैटेगरी की बस में कोई भी आम आदमी सफर नहीं कर सकता. ये बसें DS रूट के नाम से चलती हैं. ये आमतौर पर पूरी खाली होती है. सवारी के नाम पर इसमें 10-15 लोग होते हैं. कभी-कभी इससे भी कम या फिर सिर्फ सिटिंग लायक. DS नंबर की ये बसें केंद्रीय सचिवालय के आस-पास वाले ऑफिस यानी सरकारी विभाग वाले ऑफिस से बनकर क चलती हैं. इनमें स्पेसिफिक लोग ही चलते हैं. यहां से चलने के बाद सिर्फ उसी जगह रुकती हैं, जहां इस बस में बैठी सवारी को उतरना है.

क्लस्टर बसें सरकारी नहीं

क्लस्टर बसें (Cluster Bus In Delhi) सरकारी बसें नहीं है. जिनका उद्घाटन आपने कैलाश गहलोत के साथ मिलकर किया. सबसे पहली बात इसमें डेली बनाए जाने वाले 40 और 50 रुपए वाले पास नहीं चलते हैं. जबकि अधिकत्तर लोग डेली पास से सफर करते हैं. इन बसों के ड्राइवर और कंडक्टर दिल्ली सरकार या परिवहन निगम नियुक्त नहीं करती है. ठेकेदारी के तहत कंपनी ही उन्हें नियुक्त करती है. कम सैलरी की वजह से एक ही ड्राइवर 16-18 घंटे की डबल शिफ्ट में काम करते हैं. कक्लस्टर बसें सरकारी बस डिपों में खड़ी होती हैं. इससे होने वाले फायदे को दिल्ली परिवहन निगम और सरकार को कोई फायदा नहीं है. क्लस्टर बसों पर सरकार का कोई स्वामित्व नहीं है. क्लस्टर बसों की एडवरटिजमेंट के जरिए भी कमाई होती है, डीटीसी की नहीं होती.  डीटीसी के मुकाबले क्लस्टर बसें ज्यादा चलेंगी, तो इसकी कमाई भी ज्यादा होगी. इसमें नागरिक सुरक्षा गार्ड नहीं होता है. जबकि डीटीसी के बसों में होते नागरिक सुरक्षा गार्ड तैनात होते हैं. 

ऑटो के बैज बांटने में धांधली

दूसरा दिल्ली (Transportation In Delhi) के दूसरे ट्रांसपोर्ट चैन यानी ऑटो को आपने बैज़ देने के लिए कहे. आपने बुराड़ी में कुछ लोगों को दिए, लेकिन इसमें काफी धांधली और भ्रष्टाचार सामने आया. ऑटो ड्राइवर से बैज के लिए हजारों रुपए लिए गए. बाद में इसे बंद करना पड़ना. अब भी हज़ारों ऑटो ड्राइवर बिना बैज़ के ऑटो चला रहे हैं. 

सरकारी विभाग में दिहाडी़ और संविदा पर कर्मचारी

तीसरा आपने दिल्ली के सरकारी संस्थानों  (Delhi Education System) और विभागों में ठेकेदारी और दिहाड़ी व्यवस्था को खत्म करने का भी वादा किया था, लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हुआ. जल विभाग, शिक्षा विभाग, परिवहन विभाग सहित तमाम विभागों में लोगों संविदा  या दिहाड़ी के हिसाब से काम कर रहे हैं. यहां तक कि जिस दिल्ली सचिवालय में आप बैठते हैं, वहां भी सैंकड़ों लोग दिहाड़ी और संविदा पर काम कर रहे हैं. 

मुफ्त की योजना बढ़ेगा राजधानी पर बोझ

रही बात आपके (Electricity Bill Free) बिजली मीटर के दाम आधे, पानी फ्री करने की स्कीम चुनावी रणनीति लगती है. आपके मुताबिक मान भी लिया जाए कि आपकी सरकार में भ्रष्टाचार नहीं हो रहा है और सरकार को हुए आर्थिक लाभ से आप ये सुविधाएं दे रहे हैं, तो मैं  इसे सही नहीं मानता.  क्योंकि आने वाली सरकार चाहे वो आम आदमी पार्टी को हो या फिर किसी ओर पार्टी की. राजधानी पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा.  किराए में बढ़ोत्तरी जैसे कई अन्य दुष्परिणाम झेलने पड़ेंगे. दिल्ली बनाम केंद्र और मुख्यमंत्री बनाम उपराज्यपाल (Delhi CM Vs LG) का खेल फिर इससे भी ज्यादा व्यापक होगा. 
   



Monday, March 4, 2019

न्यू मीडिया का भारतीय राजनीति और समाज पर प्रभाव

इमेज क्रेडिटः लोगो गार्डन

न्यू मीडिया हमारे राजनैतिक घटनाचक्र और समाज पर बहुत तेजी से हावी हो रहा है। पिछले कुछ वर्षों से न्यू मीडिया का राजनीति और समाज पर व्यक्तिगत और सामाजिक हस्तक्षेप बढ़ा है। भारत में अभी इसकी शुरूआत ही है। 

न्यू मीडिया का प्रयोग 2.7 बिलियन लोग कर रहे है जोकि विश्व की 39 प्रतिशत आबादी है। जबकि भारत की जनसंख्या के 28 प्रतिशत लोग भारत में सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं। न्यू मीडिया के माध्यम से वैश्विक स्तर पर लोग तकनीक का विनिमय करते हैं और एक-दूसरे सामाजिक रूप से जुड़ते हैं। न्यू मीडिया के अंतर्गत ट्वीटर, फेसबुक, ब्लॉग्स, व्हाट्सएप, विकीस, लिंक्डइन, यूट्यूब आदि आते हैं।

यह पारंपरिक मीडिया, ब्रॉडकास्टिंग मीडिया और मीडिया का तकनीकी, कनवेंशनल और सांस्कृतिक बदलाब है। न्यू मीडिया के प्रभाव से भाषा में बदलाव आया है। इसके आने से समाज और राजनीति का पहले से अधिक जुड़ाव हुआ है। यह जुड़ाव नकारात्मक और सकारात्मक दोनों तरीके से हुआ है।

न्यू मीडिया नेभारत की ही नहीं बल्कि पूरे विश्व की राजनीति और समाज को प्रभावित किया हुआ है। दिसंबर 2016 में हुए अमेरिकी चुनाव, 2014 में भारतीय लोकसभा चुनाव में, 2009-10 में मिडिल ईस्ट में जैसमिन रिवोल्यूशन ऐसे कई राजनैतिक सामाजिक घटनाक्रम है जिसे न्यू मीडिया ने प्रभावित किया और कर रही है।

न्यू मीडिया से एजेंडा सेटिंग आसान
न्यू मीडिया पहले की मीडिया की तरह एजेंडा सेटिंग का काम तो कर रहा है लेकिन इसकी गति पहले के मीडिया से काफी तेज है। वाल्टर लिपमैन ने जब कहा कि लोग वास्तविक घटनाओं को नहीं देखते बल्कि मीडिया द्वारा बनाए गए अवास्तविक वातावरण पर प्रतिक्रियाएं जाहिर करते हैं। लोग मीडिया के द्वारा निर्धारित एजेंडे के अनुसार अपनी धारणाएं बनाने लगते हैं। इसके विपरीत न्यू मीडिया के आने के बाद से इन अवास्तविक वातावरण से जनता प्रभावित होती तो है लेकिन अपनी धारणाओं को प्रभावित होने से रोक लेती है। क्योंकि न्यू मीडिया के आने से लोगों के पास विकल्प बढ़ गए हैं। अब सबके पास अपनी- अपनी धारणाओं की खबर मिल जाती है। लोग उसी में संतुष्ट होने की कोशिश करते हैं। उदाहरण के तौर पर भारतीय मीडिया में किसी न्यूज चैनल या अखबार को देखता या पढ़ता है, क्योंकि वह उस चैनल या अखबार के विचारों को पसंद करता है। जैसे एनडीटीवी देखने वाले लोग जी न्यूज पसंद नहीं करते।

मीडिया सरल मॉडल
पहले मीडिया जिस समाज को क्षणिक रखना चाहती थी न्यू मीडिया ने उसे संपूर्णता की ओर अग्रसर कर दिया है। यह संपूर्णता समाज को सोचने का मौका देती है। उन्हें अपने विकल्पों को चुनने का मौका देती है। वाल्टर लिपमैन जिस सरल मॉडल को बनाने की बात कह रहे थे वो न्यू मीडिया के रूप में उभर कर सबके सामन आई  है। न्यू मीडिया के माध्यम से हम अपने सामाजिक और राजनैतिक वातावरण को आसानी से समझ सकते हैं।

बुलेट थ्योरी का नया रूप
न्यू मीडिया बुलेट थ्योरी का नया रूप भी हो सकता है। हालांकि यह उपरोक्त मत से भिन्न संदर्भ में है। लेकिन न्यू मीडिया से माध्यम से राजनैतिक दल या कोई भी सरकारी और गैर सरकारी संस्था, समुदाय या व्यक्ति तेजी से लोगों पर अपना शक्तिशाली प्रभाव स्थापित कर सकता है। कोई दल या संस्था यह प्रभाव अपनी संस्था के प्रमोशन के लिए करती है या फिर अपने प्रसिद्धि के लिए। वर्तमान समय में लगभग सभी नेताओं, राजैतिक दलों, धार्मिक समुदाय, जातीय समुदाय आदि के नाम से फेसबुक पेज, माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर, ब्लॉग्स आदि बने होते हैं जिससे ये संस्थाएं अपने-अपने विचारों और कार्यों को लोगों पर थोपने की कोशिश करते हैं। यहीं इनके द्वारा किए पोस्ट और स्टेट्स पर भी खबरों में बहुत चलती हैं।

बाल ठाकरे के खिलाफ लिखना पड़ा भारी
न्यू मीडिया में फेसबुक और ट्विटर सबसे प्रमुख स्थान रखते हैं। आपको याद होगी शाहीन धाडा जिसने फेसबुक पर सिर्फ इतना ही लिखा कि बाल ठाकरे जैसे लोग पैदा होते हैं और मर जाते हैं उसके लिए बंद क्यों? जिसके बाद से शिवसेना और मनसे ने शाहीन धाडा के परिवार पर दबाव बनाना शुरू किया। और उसे माफी मांगने पर मजबूर किया। इसके अलावा कई मामले ऐसे हैं जो वर्चुअल दुनिया में हुआ लेकिन लोगों को व्यक्तिगत रूप में इसे झेलना पड़ा। इसका एक और उदाहरण है जादवपुर विश्वविद्यालय का। जहां के एक प्रोफेसर अंबिकेश महापात्रा ने पं. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी पर बने जोक को शेयर ईमेल और फेसबुक के माध्यम से शेयर किया। जिसके बाद उनपर भी कार्रवाई की गई।

डिजिटल सरकार
वर्तमान में भारत में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार है। इस सदी की अब तक की सबसे डिजिटल सरकार। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी डिजिटल इंडिया को बढ़ावा दे रहे हैं। मेक इन इंडिया की योजना चला रहे हैं। इनकी सरकार के दो मंत्री सुषमा स्वराज और पीयूष गोयल ट्विटर और फेसबुक से मिलने वाली अपने विभाग से जुड़ी शिकायतों का निपटारा करते हैं।

सोशल मीडिया पर आंदोलन
न्यू मीडिया ने समाज में प्रभावशाली बदलाव भी किए हैं और कर रहा है। लोग न्यू मीडिया के माध्यम से कैंपेन चलाते हैं। आपको याद होगा दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा गुरमेहर कौर। जिसने यूट्यूब पर एक वीडियो पोस्ट किया था जिसमें उसने बहुत कार्डबोर्ड पकड़े हुए थे। और उनमें से एक कार्ड पर लिखा था कि मेरे पिता को पाकिस्तान ने नहीं, युद्ध ने मारा है। इसके लिए गुरमोहर कौर के खिलाफ और समर्थन में सोशल मीडिया पर लोग आए। इसी तरह की कई घटनाएं जो सोशल मीडिया की वजह से या तो बढ़ी या घटी। दिल्ली में हुए निर्भया कांड के विरोध में उतरी जनता की भीड़ सोशल मीडिया का ही परिणाम था।

सोशल मीडिया के दो पहलू
‘द ऐंड ऑफ पॉवर’ के लेखक मोइसेस नैम कहते है कि सोशल मीडिया एक तकनीक है। तकनीक के अच्छे और बुरे दोनों पहलू होते हैं। यह उपयोगकर्ता पर निर्भर करता है कि उसे किस तर से उपयोग करना है। मोइसेस कहते है कि न्यू मीडिया लोगों के लिए एक अच्छा विकल्प है। यह बहुत ही आसानी से उपलब्ध होता है।