Wednesday, December 18, 2019

डीटीसी ड्राइवर और दिल्ली गेस्ट टीचर से किया वायदा भूल गए अरविंद केजरीवाल!

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया (फोटोः एके फेसबुक)

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री-शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया सहित आम आदमी पार्टी सार्वजनिक तौर पर ढिंढोरा पीट रहे हैं कि उन्होंने अपने सभी चुनावी वायदे पूरे कर लिए हैं. उनका आखिरी वादा दिल्ली में फ्री वाई-फाई था. जिसे पूरा करने की शरुआत हो चुकी है.  लेकिन आपसे इस तरह कीउम्मीद नहीं थी. मुख्यमंत्री साहेब!

मैं वर्षों से दिल्ली में चलने वाली बसों में सफर कर रहा हूं. डीटीसी के ड्राइवर और कंडक्टर से भी अक्सर बात हो जाती है. आपका सबसे पहला वादा दिल्ली परिवहन निगम के अस्थाई ड्राइवर और कंडक्टर को पक्का करना था. जोकि अभी तक नहीं हुआ. डीटीसी के ड्राइवर और कंडक्टर न जाने कितनी बार धरने पर बैठे पर लेकिन उन्हें झूठा दिलासा दिया गया. कई बार उन्हें मजबूरी में अपनी हड़ताल वापस लेनी पड़ी. अभी तक हज़ारों डीटीसी ड्राइवर और कंडक्टर पक्के नहीं हुए है.

डीटीसी बस के प्रकार

अरविंद केजरीवाल और दिल्ली के परिवहन मंत्री कैलाश गहलोत ने पिछले दो महीने के अंदर 200 क्लस्टर बसों को इनॉग्रेट किया. लेकिन इससे किसका फायदा होगा?  सबसे लोगों को क्लस्टर और डीटीसी बसों के डिफ्रेंस को समझना होगा. दिल्ली में अभी 4 तरह की डीटीसी बस (DTC Bus Type) हैं. एक हरे रंग की लो फ्लोर बस, लाल रंग की लो फ्लोर बस (जिन्हें हम एसी बसें कहते हैं), इलेक्ट्रिक बस जो सिर्फ तीव्र मुद्रिका और 522 रूट पर कुछ दिनों तक चली. 

डीटीसी की डीएस सर्विस

चौथी कैटेगरी की बस में कोई भी आम आदमी सफर नहीं कर सकता. ये बसें DS रूट के नाम से चलती हैं. ये आमतौर पर पूरी खाली होती है. सवारी के नाम पर इसमें 10-15 लोग होते हैं. कभी-कभी इससे भी कम या फिर सिर्फ सिटिंग लायक. DS नंबर की ये बसें केंद्रीय सचिवालय के आस-पास वाले ऑफिस यानी सरकारी विभाग वाले ऑफिस से बनकर क चलती हैं. इनमें स्पेसिफिक लोग ही चलते हैं. यहां से चलने के बाद सिर्फ उसी जगह रुकती हैं, जहां इस बस में बैठी सवारी को उतरना है.

क्लस्टर बसें सरकारी नहीं

क्लस्टर बसें (Cluster Bus In Delhi) सरकारी बसें नहीं है. जिनका उद्घाटन आपने कैलाश गहलोत के साथ मिलकर किया. सबसे पहली बात इसमें डेली बनाए जाने वाले 40 और 50 रुपए वाले पास नहीं चलते हैं. जबकि अधिकत्तर लोग डेली पास से सफर करते हैं. इन बसों के ड्राइवर और कंडक्टर दिल्ली सरकार या परिवहन निगम नियुक्त नहीं करती है. ठेकेदारी के तहत कंपनी ही उन्हें नियुक्त करती है. कम सैलरी की वजह से एक ही ड्राइवर 16-18 घंटे की डबल शिफ्ट में काम करते हैं. कक्लस्टर बसें सरकारी बस डिपों में खड़ी होती हैं. इससे होने वाले फायदे को दिल्ली परिवहन निगम और सरकार को कोई फायदा नहीं है. क्लस्टर बसों पर सरकार का कोई स्वामित्व नहीं है. क्लस्टर बसों की एडवरटिजमेंट के जरिए भी कमाई होती है, डीटीसी की नहीं होती.  डीटीसी के मुकाबले क्लस्टर बसें ज्यादा चलेंगी, तो इसकी कमाई भी ज्यादा होगी. इसमें नागरिक सुरक्षा गार्ड नहीं होता है. जबकि डीटीसी के बसों में होते नागरिक सुरक्षा गार्ड तैनात होते हैं. 

ऑटो के बैज बांटने में धांधली

दूसरा दिल्ली (Transportation In Delhi) के दूसरे ट्रांसपोर्ट चैन यानी ऑटो को आपने बैज़ देने के लिए कहे. आपने बुराड़ी में कुछ लोगों को दिए, लेकिन इसमें काफी धांधली और भ्रष्टाचार सामने आया. ऑटो ड्राइवर से बैज के लिए हजारों रुपए लिए गए. बाद में इसे बंद करना पड़ना. अब भी हज़ारों ऑटो ड्राइवर बिना बैज़ के ऑटो चला रहे हैं. 

सरकारी विभाग में दिहाडी़ और संविदा पर कर्मचारी

तीसरा आपने दिल्ली के सरकारी संस्थानों  (Delhi Education System) और विभागों में ठेकेदारी और दिहाड़ी व्यवस्था को खत्म करने का भी वादा किया था, लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हुआ. जल विभाग, शिक्षा विभाग, परिवहन विभाग सहित तमाम विभागों में लोगों संविदा  या दिहाड़ी के हिसाब से काम कर रहे हैं. यहां तक कि जिस दिल्ली सचिवालय में आप बैठते हैं, वहां भी सैंकड़ों लोग दिहाड़ी और संविदा पर काम कर रहे हैं. 

मुफ्त की योजना बढ़ेगा राजधानी पर बोझ

रही बात आपके (Electricity Bill Free) बिजली मीटर के दाम आधे, पानी फ्री करने की स्कीम चुनावी रणनीति लगती है. आपके मुताबिक मान भी लिया जाए कि आपकी सरकार में भ्रष्टाचार नहीं हो रहा है और सरकार को हुए आर्थिक लाभ से आप ये सुविधाएं दे रहे हैं, तो मैं  इसे सही नहीं मानता.  क्योंकि आने वाली सरकार चाहे वो आम आदमी पार्टी को हो या फिर किसी ओर पार्टी की. राजधानी पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा.  किराए में बढ़ोत्तरी जैसे कई अन्य दुष्परिणाम झेलने पड़ेंगे. दिल्ली बनाम केंद्र और मुख्यमंत्री बनाम उपराज्यपाल (Delhi CM Vs LG) का खेल फिर इससे भी ज्यादा व्यापक होगा. 
   



Monday, March 4, 2019

न्यू मीडिया का भारतीय राजनीति और समाज पर प्रभाव

इमेज क्रेडिटः लोगो गार्डन

न्यू मीडिया हमारे राजनैतिक घटनाचक्र और समाज पर बहुत तेजी से हावी हो रहा है। पिछले कुछ वर्षों से न्यू मीडिया का राजनीति और समाज पर व्यक्तिगत और सामाजिक हस्तक्षेप बढ़ा है। भारत में अभी इसकी शुरूआत ही है। 

न्यू मीडिया का प्रयोग 2.7 बिलियन लोग कर रहे है जोकि विश्व की 39 प्रतिशत आबादी है। जबकि भारत की जनसंख्या के 28 प्रतिशत लोग भारत में सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं। न्यू मीडिया के माध्यम से वैश्विक स्तर पर लोग तकनीक का विनिमय करते हैं और एक-दूसरे सामाजिक रूप से जुड़ते हैं। न्यू मीडिया के अंतर्गत ट्वीटर, फेसबुक, ब्लॉग्स, व्हाट्सएप, विकीस, लिंक्डइन, यूट्यूब आदि आते हैं।

यह पारंपरिक मीडिया, ब्रॉडकास्टिंग मीडिया और मीडिया का तकनीकी, कनवेंशनल और सांस्कृतिक बदलाब है। न्यू मीडिया के प्रभाव से भाषा में बदलाव आया है। इसके आने से समाज और राजनीति का पहले से अधिक जुड़ाव हुआ है। यह जुड़ाव नकारात्मक और सकारात्मक दोनों तरीके से हुआ है।

न्यू मीडिया नेभारत की ही नहीं बल्कि पूरे विश्व की राजनीति और समाज को प्रभावित किया हुआ है। दिसंबर 2016 में हुए अमेरिकी चुनाव, 2014 में भारतीय लोकसभा चुनाव में, 2009-10 में मिडिल ईस्ट में जैसमिन रिवोल्यूशन ऐसे कई राजनैतिक सामाजिक घटनाक्रम है जिसे न्यू मीडिया ने प्रभावित किया और कर रही है।

न्यू मीडिया से एजेंडा सेटिंग आसान
न्यू मीडिया पहले की मीडिया की तरह एजेंडा सेटिंग का काम तो कर रहा है लेकिन इसकी गति पहले के मीडिया से काफी तेज है। वाल्टर लिपमैन ने जब कहा कि लोग वास्तविक घटनाओं को नहीं देखते बल्कि मीडिया द्वारा बनाए गए अवास्तविक वातावरण पर प्रतिक्रियाएं जाहिर करते हैं। लोग मीडिया के द्वारा निर्धारित एजेंडे के अनुसार अपनी धारणाएं बनाने लगते हैं। इसके विपरीत न्यू मीडिया के आने के बाद से इन अवास्तविक वातावरण से जनता प्रभावित होती तो है लेकिन अपनी धारणाओं को प्रभावित होने से रोक लेती है। क्योंकि न्यू मीडिया के आने से लोगों के पास विकल्प बढ़ गए हैं। अब सबके पास अपनी- अपनी धारणाओं की खबर मिल जाती है। लोग उसी में संतुष्ट होने की कोशिश करते हैं। उदाहरण के तौर पर भारतीय मीडिया में किसी न्यूज चैनल या अखबार को देखता या पढ़ता है, क्योंकि वह उस चैनल या अखबार के विचारों को पसंद करता है। जैसे एनडीटीवी देखने वाले लोग जी न्यूज पसंद नहीं करते।

मीडिया सरल मॉडल
पहले मीडिया जिस समाज को क्षणिक रखना चाहती थी न्यू मीडिया ने उसे संपूर्णता की ओर अग्रसर कर दिया है। यह संपूर्णता समाज को सोचने का मौका देती है। उन्हें अपने विकल्पों को चुनने का मौका देती है। वाल्टर लिपमैन जिस सरल मॉडल को बनाने की बात कह रहे थे वो न्यू मीडिया के रूप में उभर कर सबके सामन आई  है। न्यू मीडिया के माध्यम से हम अपने सामाजिक और राजनैतिक वातावरण को आसानी से समझ सकते हैं।

बुलेट थ्योरी का नया रूप
न्यू मीडिया बुलेट थ्योरी का नया रूप भी हो सकता है। हालांकि यह उपरोक्त मत से भिन्न संदर्भ में है। लेकिन न्यू मीडिया से माध्यम से राजनैतिक दल या कोई भी सरकारी और गैर सरकारी संस्था, समुदाय या व्यक्ति तेजी से लोगों पर अपना शक्तिशाली प्रभाव स्थापित कर सकता है। कोई दल या संस्था यह प्रभाव अपनी संस्था के प्रमोशन के लिए करती है या फिर अपने प्रसिद्धि के लिए। वर्तमान समय में लगभग सभी नेताओं, राजैतिक दलों, धार्मिक समुदाय, जातीय समुदाय आदि के नाम से फेसबुक पेज, माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर, ब्लॉग्स आदि बने होते हैं जिससे ये संस्थाएं अपने-अपने विचारों और कार्यों को लोगों पर थोपने की कोशिश करते हैं। यहीं इनके द्वारा किए पोस्ट और स्टेट्स पर भी खबरों में बहुत चलती हैं।

बाल ठाकरे के खिलाफ लिखना पड़ा भारी
न्यू मीडिया में फेसबुक और ट्विटर सबसे प्रमुख स्थान रखते हैं। आपको याद होगी शाहीन धाडा जिसने फेसबुक पर सिर्फ इतना ही लिखा कि बाल ठाकरे जैसे लोग पैदा होते हैं और मर जाते हैं उसके लिए बंद क्यों? जिसके बाद से शिवसेना और मनसे ने शाहीन धाडा के परिवार पर दबाव बनाना शुरू किया। और उसे माफी मांगने पर मजबूर किया। इसके अलावा कई मामले ऐसे हैं जो वर्चुअल दुनिया में हुआ लेकिन लोगों को व्यक्तिगत रूप में इसे झेलना पड़ा। इसका एक और उदाहरण है जादवपुर विश्वविद्यालय का। जहां के एक प्रोफेसर अंबिकेश महापात्रा ने पं. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी पर बने जोक को शेयर ईमेल और फेसबुक के माध्यम से शेयर किया। जिसके बाद उनपर भी कार्रवाई की गई।

डिजिटल सरकार
वर्तमान में भारत में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार है। इस सदी की अब तक की सबसे डिजिटल सरकार। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी डिजिटल इंडिया को बढ़ावा दे रहे हैं। मेक इन इंडिया की योजना चला रहे हैं। इनकी सरकार के दो मंत्री सुषमा स्वराज और पीयूष गोयल ट्विटर और फेसबुक से मिलने वाली अपने विभाग से जुड़ी शिकायतों का निपटारा करते हैं।

सोशल मीडिया पर आंदोलन
न्यू मीडिया ने समाज में प्रभावशाली बदलाव भी किए हैं और कर रहा है। लोग न्यू मीडिया के माध्यम से कैंपेन चलाते हैं। आपको याद होगा दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा गुरमेहर कौर। जिसने यूट्यूब पर एक वीडियो पोस्ट किया था जिसमें उसने बहुत कार्डबोर्ड पकड़े हुए थे। और उनमें से एक कार्ड पर लिखा था कि मेरे पिता को पाकिस्तान ने नहीं, युद्ध ने मारा है। इसके लिए गुरमोहर कौर के खिलाफ और समर्थन में सोशल मीडिया पर लोग आए। इसी तरह की कई घटनाएं जो सोशल मीडिया की वजह से या तो बढ़ी या घटी। दिल्ली में हुए निर्भया कांड के विरोध में उतरी जनता की भीड़ सोशल मीडिया का ही परिणाम था।

सोशल मीडिया के दो पहलू
‘द ऐंड ऑफ पॉवर’ के लेखक मोइसेस नैम कहते है कि सोशल मीडिया एक तकनीक है। तकनीक के अच्छे और बुरे दोनों पहलू होते हैं। यह उपयोगकर्ता पर निर्भर करता है कि उसे किस तर से उपयोग करना है। मोइसेस कहते है कि न्यू मीडिया लोगों के लिए एक अच्छा विकल्प है। यह बहुत ही आसानी से उपलब्ध होता है।

Saturday, July 7, 2018

कॉमनवेल्थ गेम्स ने दी दिल्ली को जहरीली हवा... अब पुनर्विकास की बारी है!


                                                                                                                ईस्ट किदवई नगर में पुनर्विकास

साल 2010 में दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम्स होने वाले थे, केंद्र और दिल्ली सरकार को दिल्ली को चमकाना था। फिर क्या दिल्ली को चमकाने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम चमकाने के लिए एक कलमाणी जी को नियुक्त किया गया। फिर क्या दिल्ली में कलमाणी योजना लागू हुई। सड़कों की चौड़ाई को दोगुनी करने का प्लान बना।

सबसे पहले सड़क के किनारे खड़े बड़े पेड़ों को बांधा गया। बांधने के बाद उन्हें कहीं ले गए जो आज तक लापता हैं। फिर योजना बनी की सड़क के दोनों ओर पहले फुटपाथ, फिर साइकिल लेन और उसके बाद मुख्य सड़क होगी। योजना पर काम शुरु हुआ। सड़क और हमारा का विकास हो गया, अब फुटपाथ और मुख्य सड़क के बीच साइकिल लेन थी। सिंगल लेन की सड़कें अब डबल हो गईं और डबल लेन की सड़कें भी डबल हो गईं। सड़क के किनारे लगे पेड़ अब पौधों के रूप में हो गए। पौधे डिवाइडर बन गए। डिवाइडर में लगे पौधे को पेड़ बनने का मौका नहीं दिया, इसलिए कॉमनवेल्ध गेम्स तक ही जी पाए।

                                                                                                              ईस्ट किदवई नगर का पुनर्विकास
सड़कों के विकास के बाद इमारतों के विकास पर जोर दिया गया। फिर एक जगह ढूंढी गई। रोहणी, वबाना, नरेला और संगम विहार जैसी सूखी जमीन नहीं। सबसे हरी-भरी। जो अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों को रास आए, अपने को रास आए। जगह मिली। यमुना का किनारा। नाम दिया गया कॉमनवेल्थ गेम्स विलेज। पर्यावरणविदों ने थोड़ा हो-हल्ला किया। फिर शांत हो गए। तब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल जैसी संस्था नहीं थी। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल भी जानबूझ कर कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 समाप्त होने के बाद बनाया गया।

खैर, अब जिन 7 कलोनियों का विकास होना है, उसमें लगभग 20000 पेड़ों की कटाई होनी है। ऐसा मैं नहीं, जिन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट में जनहित याचिका लगाई है, केके मिश्रा... वो कह रहे हैं। केके मिश्रा कैग की रिपोर्ट का हवाला दे चुके हैं। केके मिश्रा कहते हैं कि कैग की रिपोर्ट में बताया गया है कि दिल्ली में 9 लाख पेड़ों की कमी है। अब बात यह है कि पहले 9 लाख पेड़ गए कहां? अगर नहीं हैं तो सरकार कैग की रिपोर्ट को गंभीरता से क्यों नहीं ले रही हैं। सरकार दिल्ली में पेड़ क्यों नहीं लगाती? सरकार एक तो पेड़ नहीं लगा रही है और विकास के नाम पर पेड़ काटने की तैयारी कर रही है। वो भी हजारों की संख्या में।

नौरोजी नगर में पेड़ों की कटाई के बाद बनता 'विश्व व्यापार केंद्र'
यहां भी तमाम पर्यावरणविद और एनजीटी चुप है। वो स्थानीय लोगों की पहल से सरकार पर दबाव बना रहे पेड़ों की कटाई न करने के लिए। लेकिन फिर बहुत देर हो गई है। दिल्ली में किदवई नगर को पुनर्विकसित कर दिया है। यहां भी हजारों की संख्या में पेड़ काटे गए हैं। इसके अलावा नौरोजी नगर में भी सैंकड़ों की संख्या में पेड़ काट दिए गए। किदवई नगर सरकारी स्टाफ क्वार्टर को पुर्नविकिसित कर मल्टी स्टोरी बिल्डिंग तैयार कर दी गई है। अब दिवारों पर पेड़-पौधो और सूर्य नमस्कार के चित्र बनाए जा रहा हैं। रंगाई-पुताई का काम चल रहा है। यहां पर्यावरणविदों और स्थानीय लोगों के विरोध से पहले सरकार ने अपना काम कर दिया है। अब नरौजी नगर में वर्ल्ड ट्रेट सेंटर बन रहा है।

यह दिल्ली और दिल्लीवासियों के लिए राहत की खबर है कि एनजीटी और दिल्ली हाईकोर्ट ने पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी है। अब सिर्फ सुनवाई होगी। लेकिन पेड़ तो कटेंगे ही। अगर नहीं कटे तो गिरेंगे ही। यहां नहीं कहीं और दिल्ली में, दिल्ली के बाहर। पर्यावरणविद और हम कितना हल्ला मचाएंगे? विकास प्रकृति के क्षरण पर ही निर्भर है!

Friday, June 15, 2018

शिक्षा के अधिकार से लाभ कम, हानि ज्यादा

                                                                                                                                                                   Image Credit@IPleaders

शिक्षा के अधिकार को 2009 में अमलीजामा पहनाया गया।  शिक्षा के अधिकार को सरकार नें अनुच्छेद 21-क के अंर्तगत 6-14 वर्ष के बच्चें कों मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा देने का कानून बनाया। लेकिन यह नीति पूर्ण रूप से फैल रही हैं। सरकार की शिक्षा सम्बन्धी नीतियां, कानून और कार्यक्रम असफल रहें हैं। 14 वर्ष के बच्चें दुकानों पर मजदूरी करते हुए नजर आते हैं। सिग्नल पर भीख मांगते हुए नजर आते हैं। 

निशुल्क शिक्षा सिर्फ सरकारी विद्यालय में मिलती हैं जबकि निजी विद्यालय में यह सिर्फ 25% गरीब बच्चों के लिए सीटें आरक्षित की जाती हैं। इनके उपरी खर्चें छात्र के परिवार को करने पढ़ते हैं जैसे, कॉपी, किताब, वर्दी, जूते आदि। सरकारी विद्यालय में उचित रूप से पढ़ाई न होने के कारण भी गरीब व्यक्ति अपने बच्चे को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाते हैं। क्या करे मजबूरी हैं न कोई गरीब अपने बच्चों को अपनी तरह अभाव की स्थिति में नहीं देखना चाहता है। बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए मेहनत कर अपनी सारी आमदनी खर्च करता है।

सरकार 6-14 वर्ष तक के बच्चों की निशुल्क शिक्षा की बात करती हैं लेकिन 6 वर्ष से कम उम्र और14 वर्ष से अधिक बच्चों का क्या? प्राइवेट स्कूलों में नर्सरी में दाखिले के लिए माता-पिता बच्चें की तीन वर्ष की उम्र से भागदौड़ करते हैं और प्राइवेट स्कूलों की मनमानी का शिकार होते हैं। सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद भी प्राइवेट स्कूलों की नर्सरी में दाखिला न होना बेइमानी सी लगती है। दाखिला के नाम पर डोनेशन की प्रथा बना दी गई है। 

14 वर्ष की उम्र मे बच्चा 9वीं या 10वीं कक्षा तक होता है लेकिन क्या उसके बाद कोई खर्च नहीं होता? जबकि विद्यार्थीयों को 11वीं कक्षा से लेकर भी जहां तक वह पढ़ते हैं उसका खर्च किसी अभिभावक से वहन नहीं होता है। आज देश में 12वीं पास करने के बाद विश्वविद्यालय से पूरी तरह से मुंह मोड़ लेते हैं। कुछ लोग स्नातक करते हुए पार्ट टाइम जॉब करते हैं। जिससे उनकी उचित रूप में पढ़ाई नहीं हो पाती और न ही जॉब का उतना कोई लाभ मिलता है।

शिक्षा के अधिकार में शिक्षक छात्र अनुपात को 40 छात्रों को एक अध्यापक पढ़ाएगा लेकिन सरकारी विद्यालयों में आज भी 60 से अधिक छात्र होते हैं, ऐसे में शिक्षा की क्या परिस्थितियां होगी? कई विद्यालयों में आवश्यकतानुसार शिक्षक भी नही हैं। मिड डे मील के बारें मे हम सभी बखूबी जानते हैं कि स्कूलों में दोपहर में मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता कैसी है। भोजन में कीड़े, छिपकलियां, जैसे जीव अक्सर पाए जाते हैं। बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में स्कूलों की लापरवाही के कारण बहुत से बच्चे बीमार भी हुए हैं।

नो फेल पॉलिसी के तहत सरकार ने पहली से आठवीं कक्षा तक के छात्रों कों ऐसे ही पास करने की नीति बनाई हैं। जिससे की अब आठवीं तक कोई भी छात्र फेल नही होगा। हालांकि नो फेल पॉलिसी का क्रियान्वन छात्रों की पढ़ाई को बेहतर करने के लिए ही किया गया ताकि छात्र पास-फेल के लिए न पढ़ें, सीखने के लिए पढ़ें लेकिन शिक्षकों ने उनका साथ नहीं दिया और कक्षा में पढ़ाई को लेकर कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। इससे आठवीं तक तो सभी छात्र पास हो जाते लेकिन उनका ज्ञान पांचवी कक्षा के छात्र के बराबर भी नहीं होता। एक रिपोर्ट की मुताबिक 5वीं कक्षा के 53.5 प्रतिशत बच्चे ही दूसरी कक्षा की किताब पढ़ पाते हैं।

कुल मिलाकर भारतीय शिक्षा की नींव कमजोर होती जा रही है... जिसके फल भी रोगयुक्त हो रहे हैं। आज बच्चे पास तो हो जाते है लेकिन पढ़ने में असफल हो रहे हैं। और इसका मुख्य कारण यह भी है की लोग पास होने के लिए पढ़ना चाहते है सीखने के लिए नहीं। 
Note: लेख बहुत पुराना है... लेकिन थोड़ा प्रासांगिक है

Saturday, May 26, 2018

इस कोरियन सीरियल ने दिखाए भारत को पोस्को के सपने... फिर हुई थी तूतीकोरिन जैसी घटनाएं


मेरे लिए इन दो तस्वीरों का ओडिशा और पोस्को से गहरा संबंध है। उस समय शायद 9वीं या 10वीं क्लास में था। डीडी वन (डीडी नेशनल) पर रात साढ़े आठ बजे ये सीरियल आता था। सीरियल का नाम था 'घर का चिराग' (द लैम्प ऑफ द हाउस) और 'समुद्र का बादशाह' (एम्परर ऑफ सी)। मैं इन दोनों सीरियल को चाइनीज समझता था। लेकिन आज सर्च किया तो पता चला कि यह कोरिया का सबसे प्रसिद्ध सीरियल है। इल सीरिय को पूरे विश्व में अलग-अलग नाम और अलग-अलग भाषाओं में प्रसारित किया गया।

सीरियल की कहानी बहुत ही इंस्पायरिंग है। इस सीरियल के दौरान बीच में एक विज्ञापन आता था। इसी सीरियल में मैंने पहली बार पोस्को (POSCO) का विज्ञापन देखा। उस समय उड़ीसा (अब ओडिशा) में पोस्को का प्लांट लगने वाला था। सरकार और कंपनी विज्ञापन के माध्यम से लोगों को पोस्को के फायदे गिना रही थी मसलन रोजगार, अच्छी सुविधाएं पीने का पानी, बच्चों के लिए एजुकेशन और बहुत कुछ। देखने में बहुत अच्छा लगता था। लेकिन वास्तविकता कुछ सालों बाद पता चली।

2005 में पोस्को ने ओडिशा सरकार के साथ समझौता कर 12 मिलियन टन वार्षिक उत्पादन वाली क्षमता का स्टील प्रोजेक्ट जगतसिंहपुर जिले में स्थापित करने की योजना बनाई। यह समझौता विश्व सबसे बड़ा समझौता माना गया क्योंकि पहली बार भारत में किसी विदेशी (दक्षिण कोरिया) कंपनी ने 52 हजार करोड़ रुपए का निवेश किया था।

लेकिन इस प्रोजेक्ट का स्थानीय लोगों ने विरोध किया। ग्रामीणों की जमीनें जबरदस्ती हथियाई जाने लगी, ग्रामीणों के विरोध पर पुलिस और प्रशासन द्वारा बर्बर कार्रवाई की जा रही थी। पोस्को और ओडिशा सरकार ने ग्रामीणों को जो सपने दिखाए वो टूटने लगे थे। सरकार और पोस्को ने प्लांट के लिए लाखों पेड़ों को काट दिया, रोजगार के जितने वायदे किए थे सरकार ने उसे पूरा नहीं किया जिससे ग्रामीणों ने सरकार और पोस्को के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया था।

समझौता होने के बाद ओडिशा सरकार ने पोस्को को 4004 एकड़ की तटीय जमीन भी दी। ग्रामीणों के भारी विरोध के बाद इस प्रोजेक्ट में बाधा आने लगी। ग्रामीणों ने उनकी जमीनों पर हो रहे जबरदस्ती कब्जों का विरोध किया। संयंत्र के निर्माण के लिए मुख्य रूप से पारादीप के पास बंगाल की खाड़ी की उपजाऊ तटीय क्षेत्र ओडिशा सरकार से खरीदा गया, जहां शराब बनाने के लिए अंगूर की खेती का काम होता था, ग्रामीण ने इस जमीन अधिग्रहण का विरोध किया।

यहां की अर्थव्यवस्था बीटल वाइन्स पर ही आधारित थी। धिनकिया के 8 गांवों के 20 हजार लोग, नौगांव और गडकुजंगा की ग्राम पंचायतें भी इस प्रोजेक्ट से प्रभावित थी। स्टील प्लांट के लिए ली गई 4004 एकड़ में से 3000 एकड़ की जमीन सिर्फ वनक्षेत्र था, यहां की रेतीली धरती पर 5000 बीटल वाइन्स (अंगूर की शराब) तैयार की जाती थी। इस वाइनयार्ड्स से किसानों को औसतन 20000 हजार प्रतिमाह कमाई होती थी।

ग्रामीणों में यूनाइटेड एक्शन कमिटी के द्वारा फूड डाली गई। कमिटा प्रभाव सबसे अधिक नौगांव में था, ये सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र था जो पोस्को के समर्थन में था। यहां प्रो-पोस्को और एंटी पोस्को ग्रुप बने। जो आपस में टकराने लगे।

खनन विशेषज्ञों का कहना है कि पोस्को बिना किसी सौदेबाजी के सुंदरगढ़ जिले के खदाधर पहाड़ी क्षेत्र 1200 रुपए प्रति टन के हिसाब से निकाल रहा था जबकि बाजार में उस समय 3500 प्रति टन का भाव चल रहा था।

पहले पोस्को ने ओडिशा में मनमाने तरीके से अधिग्रहण किया। अब तूतीकोरिन में वेदांता ने किया। तूतीकोरिन में वेदांता के स्टरलाइट कॉपर प्लांट ने स्थानीय लोगों को जो सपने दिखाए उस पर गोलियां और लाठियां चलवाई। विपक्षी नेता विरोध ऐसे संयंत्रों और सरकारी की नीतियों का विरोध करते हैं। लेकिन जब स्वयं सत्ता में आते हैं तो व्यापार और भ्रष्टाचार के आगे लोकहित भूल जाते हैं। केंद्र सरकार और राज्य सरकार को इस तरह के संयंत्रों को स्थापित करने से पहले एक अच्छी नीतियां बनानी चाहिए जो लोकहित में हो। ग्रामीणों को हित में हो। उन्हें अच्छे रोजगार के अवसर दे सके और पर्यावरण और स्वास्थ्य का विशेष रखे। 

Wednesday, May 23, 2018

तूतीकोरिन घटना का ये है वेदांता से संबंध...

Image Credit @Mahanagar 24x7

तमिलनाडु के तूतीकोरिन में 22 मई  को स्टरलाइट कॉपर प्लांट के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों पर तमिलनाडु पुलिस ने लाठी चार्ज और फायरिंग की। इस फायरिंग में अब तक 12 लोगों की मौत हो गई और लगभग 50 से ज्यादा लोग घायल हो गए हैं।

हिंसा को देखते को तूतीकोरिन में धारा 144 लगा दी गई है। 11 लोगों की मौत के बाद मद्रास हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए 23 मई को इस पर सुनवाई की और प्लांट के विस्तार तहत होने वाले निर्माण पर रोक लगा दी।

स्टरलाइट कॉपर प्लांट  क्या है?

तूतीकोरिन के ग्रामीण जिस स्टरलाइट कॉपर प्लांट का विरोध कर रहे हैं, वह वेदांता लिमिटेड की एक यूनिट है। पहले इसे 'सेसा स्टरलाइट लिमिटेड' और 'सेसा गोआ लिमिटेड' के नाम से जाना जाता था।

वेदांता लिमिटेड विश्व की सबसे बड़ी कंपनी है जो प्राकृतिक संसाधन जिंक सिल्वर, तेल और गैस, लोह, अयस्क, तांबे और एल्यूमीनियम जैसी धातुओं का उत्पादन करती है। धातू के क्षेत्र में कंपनी सर्वोच्च व्यापारिक शक्ति रखती है।

तमिलनाडु और केंद्र शासित प्रदेश दादरा नगर हवेली में वेदांता की कई यूनिट्स है। यह यूनिट्स हर साल 4 लाख मेट्रिक कॉपर को उत्पादन करती है और तूतीकोरिन में बने कोयला आधारित बिजली संयंत्र से 160 मेगावाट बिजली का निर्माण करती है। इसके अलावा, सिलवासा में दो कॉपर रोड्स प्लांट है- एक चिंचपाड़ा और दूसरी पिपरिया में। तूतीकोरिन, एक तटीय शहर, यह देश के सबसे बड़े बंदरगाहों (पोर्ट) में से एक है, जो कंपनी के संचालन और ट्रांसपोर्टेशन  की सहायता करता है।

स्टरलाइट कॉपर के खिलाफ विरोध लगभग दो दशक पहले शुरु हुआ था। लेकिन विरोध कभी इतना उग्र रूप नहीं ले पाया। इस साल की शुरुआत में कंपनी ने इस प्लांट का विस्तार करने की घोषणा की, जिसके बाद लोगों ने इसका विरोध करना शुरु किया। कंपनी अपनी विस्तार नीति के तहत अपने उत्पादन को दोगुना करना चाहती थी। कंपनी पहले जहां 4 लाख मेट्रिक टन प्रतिवर्ष उत्पाद कर रही है, वहीं विस्तार के बाद यह 8 लाख मेट्रिक टन प्रतिवर्ष करना चाहती है।

भारत में वेदांता की स्टरलाइट और आदित्य बिरला ग्रुप की हिंडाल्को इंडस्ट्रीस लिमिटेड सबसे ज्यादा कॉपर उत्पादन करने वाला प्लांट है। इसके साथ-साथ केंद्र सरकार की सार्वजनिक ईकाई हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की क्षमता 99,500 मेट्रिक टन प्रतिवर्ष है। हिंडाल्को इंडस्ट्रीज और स्टरलाइट भारत के कॉपर बाजार में प्रभुत्व रखते हैं। वर्तमान में हिंडाल्को 5 लाख टन और स्टरलाइट 4 लाख टन कॉपर का सालाना उत्पादन करते हैं।

ग्रामीणों को गंभीर बीमारियां

तूतीकोरिन में स्थापित इस स्टरलाइट कॉपर प्लांट ने पर्यावरण के मानकों को पूरा करने में असफल रही है। ग्रामीणों का कहना है कि प्लांट की वजह से जमीन का पानी दूषित हो रहा है, जिसका सीधा असर हमारे स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि स्टरलाइट प्लांट से निकलने वाले धुएं और रसायन से गांव के लोगों को कैंसर और सांस की बिमारियां भी हो रही हैं। करीब 18 गांव के लोग इस प्लांट का विरोध कर रहे हैं।

Translated By Me From-Indian Express

Thursday, September 7, 2017

अभी और लंकेश का मरना बाकी...

गौरी लंकेश की अंतिम विदाई 
एक तथाकथित पत्रकार होने के नाते यह कह सकता हूं कि गौरी लंकेश एक खबर है. पंसारे, कुलबर्गी और लंकेश जैसे पत्रकार आने वाले समय भी मारे जाएंगे. हम लोग तब भी यहीं पूछेंगे कि स्वतंत्र अभिव्यक्ति को क्यों दबाया गया? किसने की हत्या?

पंसारे, कुलबर्गी और लंकेश तो चर्चित लोग थे इसलिए इतना विरोध प्रदर्शन भी हो गया. या कह लो की एक खास विचारधारा से संबंधित होने के नाते इतना विरोध प्रदर्शन देश भर के पत्रकारों ने कर दिया. लेकिन उन पत्रकारों (राजदेव रंजन, जगेंद्र सिंह, संदीप कोठारी, रामचंद्रछत्रपति, राजेश मिश्रा, साई रेड्डी और बहुत लोग) के समर्थन में कितने लोग आए, जो अब तक मारे गए. कितने लोगों ने और कब तक विरोध प्रदर्शन किया? सिर्फ उनके साथ काम करने वाले लोग या वो लोग जो उस संस्थान जुड़े हुए थे. एक-दो चैनलों ने थोड़ी-बहुत कवरेज की और एक दो बार फॉलोअप किया. लेकिन उनके हत्यारों का अभी तक पता नहीं चला है. फिर हम लोग शांत हो गए, एक अभिव्यक्ति की आवाज दबने तक. फिर हम शांत हो जाएंगे अगली अभिव्यक्ति की मौत तक.

अब यही हाल गौरी लंकेश के साथ भी होगा? उम्मीद है पुलिस इनके हत्यारों का पता लगाने के साथ-साथ हत्या करने का कारण भी पता लगाए. इसके साथ यह भी पता लगाए कि हत्या किसी राजनीतिक दबाव में हुई या किसी सामाजिक दुश्मनी के कारण हुई?

लंकेश की हत्या पर हो रहे पत्रकारों के प्रदर्शन भी खास विचारधारा से प्राभावित लगती है. नहीं तो इनसे पहले हुई पत्रकारों की हत्या पर कितने पत्रकारों को ने इस तरह का विरोध या शोक जताया.

मैं तमाम मीडिया हाउस से उम्मीद करता हूं कि गौरी लंकेश की मौत से आहत होने के साथ-साथ न्याय मिलने तक पुलिस प्रशासन पर सवाल उठाते रहें. लंकेश को खबरों और प्राइम टाइम की डिबेट तक सीमित न रहने दे.
गौरी लंकेश और उनकी पत्रकारिता को नमन