Saturday, July 7, 2018

कॉमनवेल्थ गेम्स ने दी दिल्ली को जहरीली हवा... अब पुनर्विकास की बारी है!


                                                                                                                ईस्ट किदवई नगर में पुनर्विकास

साल 2010 में दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम्स होने वाले थे, केंद्र और दिल्ली सरकार को दिल्ली को चमकाना था। फिर क्या दिल्ली को चमकाने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम चमकाने के लिए एक कलमाणी जी को नियुक्त किया गया। फिर क्या दिल्ली में कलमाणी योजना लागू हुई। सड़कों की चौड़ाई को दोगुनी करने का प्लान बना।

सबसे पहले सड़क के किनारे खड़े बड़े पेड़ों को बांधा गया। बांधने के बाद उन्हें कहीं ले गए जो आज तक लापता हैं। फिर योजना बनी की सड़क के दोनों ओर पहले फुटपाथ, फिर साइकिल लेन और उसके बाद मुख्य सड़क होगी। योजना पर काम शुरु हुआ। सड़क और हमारा का विकास हो गया, अब फुटपाथ और मुख्य सड़क के बीच साइकिल लेन थी। सिंगल लेन की सड़कें अब डबल हो गईं और डबल लेन की सड़कें भी डबल हो गईं। सड़क के किनारे लगे पेड़ अब पौधों के रूप में हो गए। पौधे डिवाइडर बन गए। डिवाइडर में लगे पौधे को पेड़ बनने का मौका नहीं दिया, इसलिए कॉमनवेल्ध गेम्स तक ही जी पाए।

                                                                                                              ईस्ट किदवई नगर का पुनर्विकास
सड़कों के विकास के बाद इमारतों के विकास पर जोर दिया गया। फिर एक जगह ढूंढी गई। रोहणी, वबाना, नरेला और संगम विहार जैसी सूखी जमीन नहीं। सबसे हरी-भरी। जो अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों को रास आए, अपने को रास आए। जगह मिली। यमुना का किनारा। नाम दिया गया कॉमनवेल्थ गेम्स विलेज। पर्यावरणविदों ने थोड़ा हो-हल्ला किया। फिर शांत हो गए। तब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल जैसी संस्था नहीं थी। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल भी जानबूझ कर कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 समाप्त होने के बाद बनाया गया।

खैर, अब जिन 7 कलोनियों का विकास होना है, उसमें लगभग 20000 पेड़ों की कटाई होनी है। ऐसा मैं नहीं, जिन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट में जनहित याचिका लगाई है, केके मिश्रा... वो कह रहे हैं। केके मिश्रा कैग की रिपोर्ट का हवाला दे चुके हैं। केके मिश्रा कहते हैं कि कैग की रिपोर्ट में बताया गया है कि दिल्ली में 9 लाख पेड़ों की कमी है। अब बात यह है कि पहले 9 लाख पेड़ गए कहां? अगर नहीं हैं तो सरकार कैग की रिपोर्ट को गंभीरता से क्यों नहीं ले रही हैं। सरकार दिल्ली में पेड़ क्यों नहीं लगाती? सरकार एक तो पेड़ नहीं लगा रही है और विकास के नाम पर पेड़ काटने की तैयारी कर रही है। वो भी हजारों की संख्या में।

नौरोजी नगर में पेड़ों की कटाई के बाद बनता 'विश्व व्यापार केंद्र'
यहां भी तमाम पर्यावरणविद और एनजीटी चुप है। वो स्थानीय लोगों की पहल से सरकार पर दबाव बना रहे पेड़ों की कटाई न करने के लिए। लेकिन फिर बहुत देर हो गई है। दिल्ली में किदवई नगर को पुनर्विकसित कर दिया है। यहां भी हजारों की संख्या में पेड़ काटे गए हैं। इसके अलावा नौरोजी नगर में भी सैंकड़ों की संख्या में पेड़ काट दिए गए। किदवई नगर सरकारी स्टाफ क्वार्टर को पुर्नविकिसित कर मल्टी स्टोरी बिल्डिंग तैयार कर दी गई है। अब दिवारों पर पेड़-पौधो और सूर्य नमस्कार के चित्र बनाए जा रहा हैं। रंगाई-पुताई का काम चल रहा है। यहां पर्यावरणविदों और स्थानीय लोगों के विरोध से पहले सरकार ने अपना काम कर दिया है। अब नरौजी नगर में वर्ल्ड ट्रेट सेंटर बन रहा है।

यह दिल्ली और दिल्लीवासियों के लिए राहत की खबर है कि एनजीटी और दिल्ली हाईकोर्ट ने पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी है। अब सिर्फ सुनवाई होगी। लेकिन पेड़ तो कटेंगे ही। अगर नहीं कटे तो गिरेंगे ही। यहां नहीं कहीं और दिल्ली में, दिल्ली के बाहर। पर्यावरणविद और हम कितना हल्ला मचाएंगे? विकास प्रकृति के क्षरण पर ही निर्भर है!

No comments:

Post a Comment